Thursday, October 6, 2011

तब और अब का दशहरा

कुछ दिन पूर्व नवरात्री एवं दशहरा को लेकर कुछ मित्रों से चर्चा हो रही थी। चर्चा में लगभग सभी अपने-अपने बचपन की यादों को ताजा कर रहे थे। बचपन में इस त्यौहारी मौसम का इंतजार, भागीदारी, घुमना, मस्ती करना जैसे कई प्रसंगों पर बातें। और अंत में उनदिनों की आज से तुलना करते हुए यह कहना कि वैसी रामलीला या दशहरा अब कहां देखने को मिलता है।

यह एक मुश्किल काम है कि पूर्व की तुलना वर्तमान से किया जाए। यदि आज के बच्चों को उन दिनों की तरह सहज एवं साधारण रामलीला देखने को मिले, तो वे शायद ही उन्हें देखने जाए। आज इतने ग्लैमराइज्ड तरीके से रावण का पुतला दहन कार्यक्रम आयोजित करने के बावजूद उसमें उमड़ने वाली भीड़ शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र के कमजोर तबके की ज्यादा होती है।

जब हम अपने बचपन के दिनों को याद करते हैं, तो उनदिनों की उत्सवधर्मिता आज से कई मायने में बेहतर थी। मुझे अपने बचपन की याद आज भी है, जब मैं गांव में रहा करता था। उन दिनों दशहरा का बेसब्री से इंतजार रहता था। मतलब कुछ खास होता था - दस दिनों की छुट्टी। दशहरा के पहले नवरात्री में नवदुर्गा की झांकियां और दसवें दिन रावण का पुतला दहन। उन दिनों गली-गली में नवदुर्गा की झांकियां नहीं होती थी और न ही हर गांव में या मोहल्ले में रावण दहन। शायद इसलिए इस आयोजन को देखने के प्रति खास लगाव होता था। मेरे गांव से शहर की दूरी लगभग 8 किलोमीटर है। वहीं रामलीला का बड़ा आयोजन होता था। रामलीला का आयोजन दस दिन तक और दसवें दिन यानी रावण दहन।

बहुत मजा आता था, जब रामलीला में अलग-अलग प्रसंगों में लोकगीतों की प्रस्तुति होती थी। ढोलक, हारमोनियम के वादन पर नायिकाओं द्वारा गीतों की प्रस्तुति देखते हुए यह नहीं लगता था कि रामलीला देख रहे हैं। बल्कि वह एक अलग टुकड़ा ही होता था, जो लोगों को दर्शक दीर्घा में बांधे रखने के लिए जरूरी होता था। लंबी तान पर चारों ओर घुमते हुए विरह का दृश्य हो, तो भी लोगों के चेहरे पर मुस्कराहट देखी जा सकती थी। कई ऐसे वाकये भी हुए, जब लंकेश की ओर के पात्रों के प्रति संवेदनाएं जाग जाती थी। ऐसा लगता था कि बेचारा! नाहक ही पंगा ले लिया है। क्या जरूरत थी, राम से पंगा लेने की। वैसे समय पर राम की ओर के पात्रों पर गुस्सा आता था। राक्षस पात्रों की भूमिका निभा रहे बच्चों के मासूम चेहरे महिलाओं की ममता के हकदार बन जाते थे।

कई बार पात्र अपना डायलॉग भूल जाते थे। उस समय हास्यास्पद स्थिति बन जाती थी। पर्दे के पीछे से पात्रों को डायलॉग पढ़कर सुनाया जाता था और फिर मंच पर पात्र उसे दोहराते थे। ऐसा नहीं है कि इस तरह की प्रस्तुति को कोई खराब कह दे या फिर खारिज कर दे। यह बता पाना मुश्किल है कि वह आस्था का कारण था या फिर लोक संस्कृति के प्रति सम्मान का।

उन दिनों की एक बात और ज्यादा मायने रखती थी, वह है साझा संस्कृति की। रामलीला का आयोजन समाज की ओर से किया जाता था। वह पूरे समाज की उत्सवधर्मिता थी। उसमें धर्म या जाति का सरोकार मायने नहीं रखता था। एक-दूसरे के प्रति सम्मान का खास ख्याल रखा जाता था। तब इस ओर ध्यान ही नहीं जाता था कि इसमें दूसरे धर्मावलंबियों की भागीदारी कितनी है। ऐसे आयोजन से एक-दूसरे के नजदीक आने के बहाने मिलते थे।

निश्चय ही इस तरह से देखा जाए, तो तब और अब में बहुत फर्क नजर आता है। आज विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच कटुता की पाट चौड़ी की जा रही है, जिसकी वजह से कोई भी आयोजन सामाजिक कम, धार्मिक ज्यादा बनता जा रहा है। इससे समाज के विभिन्न समुदायों के बीच समभाव की भावना घटती जा रही है। अब दशहरा का आयोजन भव्यता और प्रतियोगी भाव का आयोजन बन गया है। ऐसे में अपने बचपन के दिनों वाले दशहरा को याद किया जाए, तो क्या गलत है?

Friday, January 1, 2010

नदी छूट गयी, हमारी जिंदगी छूट गयी

एक बार फिर समय की कसौटी हमारे सामने हैं। नए साल के रूप में। २००९ की विदाई के बाद २०१० तो आना ही था। और वो आ गया। पिछले साल की बेतरतीब ज़िन्दगी को कुछ सलीके में लाने की जद्दोजहद के साथ एक दूसरे को बधाइयाँ देते हुए। पर ज़िन्दगी को व्यवस्थित करने की हमारी यह रफ़्तार धीरे-धीरे धीमी पद जएगी महीने दर महीने और २०१० के अंत तक एक बार फिर बेतरतीब। और नए संकल्पों के साथ सलीके के ढलने की हमरी जिद और धीरे-धीरे फिर ज़िन्दगी का बेतरतीबी की ओर बढ़ते जाना। पर सवाल यह है कि जिसे हम सलीका कहते हैं क्या वास्तव में वो सलीका है भी या नहीं? शायद हम मशीन होते जाने की प्रक्रिया को सलीका कहते हैं, गोया ज़िन्दगी भी मशीन हो। तो ज़िन्दगी का सलीका है क्या?
इसे हम नदी की धारा से समझ सकते हैं। मशीन से परे, अपनी ही चल में मस्त, कभी इधर तो कभी उधर, कभी कूदना तो कभी फांदना, कभी पतली तो कभी चौड़ी, कभी-कभी कहीं सूखी भी। पर क्या हमने कभी सोचा हैं कि नदी को सलीके में लाने की प्रक्रिया में हम नदी को ख़त्म कर देते हैं। हमारे सामने मरती हुई नदियों की फेहरिस्त है, शायद आपके पास भी होगी।
ज़िन्दगी और नदी यानी अपने ही रौ में बहते जाने की कहानी।
पर बात फिर वही आकर रुक जाती है कि ज़िन्दगी का सलीका है क्या? तो हमें ये अपने से ही पूछना होगा कि जिस सलीके कि ओर हम जाना चाहते हैं वो हमने तय किया है कि बाज़ार ने। आज बाज़ार ही तो सब कुछ तय कर रहा है। ऐसे में हम जिस सलीके कि ओर बढ़ना चाहते हैं वो सलीका भी बाज़ार ने ही तय किया है। बिना किसी सोच के, बिना किसी विचार के हम वो करते जा रहे हैं जिसे बाज़ार ने तय किया है। बाज़ार तो चाहता है कि आप कुछ सोचें नहीं, कुछ सवाल खड़ा नहीं करे और जो तय है उसे करते जाएँ। तय तो यही है कि आप रात दिन लगे रहे काम काम पर, कुछ दिन कि छुट्टी आपको इतना पीछे कर देगी कि आपसे वे सब आगे निकल जायेंगे जो आपसे पीछे थे।
पर आज एक बार फिर सोच लें, इस दौड़ में आपके साथ कौन-कौन हैं, कौन पीछे छूट गया, पीछे मुड़ कर देख ले तो जरा।
अरे!!!! ये क्या, हम २०१० में आ गए और हमारी जिंदगी २००९ में रह गयी, नहीं-नहीं शायद उससे भी पीछे १९९० के पहले। ओह!!! ये क्या हो गया। हम इतने आगे निकल आये - नदी छूट गयी, हमारी जिंदगी छूट गयी।
चलो हम मुड़ चले, ले आयें अपनी नदी को, अपनी ज़िन्दगी को।

Monday, August 11, 2008

कभी-कभार

कभी-कभार शीर्षक से आप यह न समझ बैठना कि मैंने अशोक जी के कॉलम पर कुछ लिखने का निर्णय लिया है। बात इससे बिल्कुल जुदा है। कभी कभार क्या से क्या हो जाता है, कुछ समझ में नहीं आता। आखिर यह कभी कभार का काल आता क्यूं है। पर इसको कभी कभार आना होता है तो आएगा ही, बचना मुश्किल है। इस कभी कभार वाले काल से गुजरते हुए बहुत खुश रहने वाला उदास हो जाता है तो उदास रहने वाला खुश हो जाता है। होने को तो कोई भी कारण हो सकता है पर कभी कभार कारण को पहचान पाना मुश्किल हो जाता है और ऐसा होता भी कभी कभार ही है। कल के दिन घंटों झील के किनारे सचिन बुन्देलखंडी के साथ बैठा रहा और कई बातें हुई, साथ ही मैंने फिशिंग करने की कोशिश भी कि पर एक भी हाथ नहीं आई। पूरे तालाब में कितनी मछलियाँ होंगी, एक अनुमान लगाया, पर मेरे हिस्से कि नहीं थी तो कांटे में नहीं आई। खैर, बात कभी कभार की हो रही थी और मैं आपको तालाब पर लेकर चला गया। वो भी भोपाल के बड़े तालाब पर, जहाँ जाकर लौटने को मन नहीं करता। पर कभी कभार ऐसा ही होता है, जाना कही और होता है और हम चले कही और जाते हैं। वापस आने की चाह होती है पर कभी कभार हम इतना आगे चले जाते है कि वापस आने के लिए कभी कभार बहुत सोचना पड़ता है। कभी कभार तो लौट ही नहीं पाते और कभी कभार जल्दी निर्णय ले लेते है वापसी का। बाज़ार भी तो है जो रोक देता है कोई भी नए निर्णय लेने से। पर बाज़ार भी क्या करे, उसकी तो आदत है। गलती तो अपनी है कि हम उसके रस्ते चल पड़ते है। कभी कभार रास्ता बदलना भी पड़ता है और कभी कभार रास्ता ख़ुद ब ख़ुद बदल जाता है। रास्ता कभी कभार क्यूं बदलना पड़ता है यह समझ में नहीं आता या फिर जी चाहता है समझ कर भी नहीं समझा जाए। हालत कभी कभार मुश्किल में होते है और कभी कभार कुछ सूझता नहीं किया क्या जाए। बहुत कुछ करने के बाद भी कभी कभार नतीजा सिफर ही होता है और कभी कभार... । कभी कभार मौसम भी और कभी कभार अपने भी.... साथ। खैर कभी कभार आप भी सोचे की कभी कभार ऐसा क्यों होता है।